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ऑस्कर क्लेन मेडल पाने वाले पहले भारतीय बने अशोक सेन

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बेंगलुरु. फिजिक्स वैज्ञानिक प्रोफेसर अशोक सेन को दुनिया के प्रतिष्ठित ऑस्कर क्लेन मेडल 2026 के लिए चुना गया है.
यह भारतीय विज्ञान के लिए बड़ी उपलब्धि इसलिए भी है क्यूँ कि अशोक सेन यह बड़ा सम्मान पाने वाले पहले भारतीय भौतिक विज्ञानी बन गए हैं.

बेंगलुरु के थियोरेटिकल फिजिसिस्ट अशोक सेन भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक हैं. सेन से पहले कई नोबेल पुरस्कार विजेताओं और स्टीफन हॉकिंग व पीटर हिग्स जैसी महान हस्तियों को यह अवॉर्ड मिल चुका है.

स्ट्रिंग थ्योरी में अपने शानदार योगदान के लिए इंटरनेशनल लेवल पर पहचाने जाने वाले प्रोफेसर सेन ने स्वीडन की स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी में ग्रैविटी फ्रॉम स्ट्रिंग्स एंड स्ट्रिंग्स फ्रॉम ग्रैविटी (गुरुत्वाकर्षण से स्ट्रिंग्स और स्ट्रिंग्स से गुरुत्वाकर्षण) विषय पर एक शानदार लेक्चर दिया था.

एक लाइन उनके संघर्ष को बताती है…

अशोक सेन की कही एक लाइन उनके संघर्ष को बताती है- 90 प्रतिशत समय मैं किसी समस्या में उलझा रहता हूं. आज उन्होंने फिजिक्स का प्रतिष्ठित पुरस्कार जीतकर भारतीय विज्ञान की काबिलियत का डंका दुनिया भर में एक बार फिर से बजा दिया है.

सेन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) के इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल साइंसेज (ICTS) में काम करते हैं. उन्हें दुनिया भर में स्ट्रिंग थ्योरी के अग्रदूतों में से एक माना जाता है.

यह फिजिक्स की एक एडवांस्ड ब्रांच है जो ब्रह्मांड के सभी रहस्यों को यूनिफाइड थ्योरी के जरिए समझाने का प्रयास करती है. निदेशक राजेश गोपाकुमार ने कहा, ‘पुरस्कार पाने वालों की लिस्ट को देखते हुए यह सम्मान बहुत प्रतिष्ठित माना जाता है. यह सम्मान दुनिया भर के फिजिक्स विज्ञानियों के बीच सेन के कद को बताता है.’

स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी और रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज की नोबेल कमिटी फॉर फिजिक्स की ओर से संयुक्त रूप से दिया जाने वाला यह मेडल स्वीडिश भौतिक विज्ञानी ऑस्कर क्लेन के नाम पर रखा गया है. यह सैद्धांतिक फिजिक्स और ब्रह्मांड विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) के क्षेत्र में किए गए कार्यों के लिए दिया जाता है.

सेन को स्ट्रिंग थ्योरी के क्षेत्र में दुनिया की प्रमुख हस्तियों में से एक माना जाता है.स्ट्रिंग थ्योरी का मकसद गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) और क्वांटम मैकेनिक्स को एक साथ जोड़ना है. सेन को वर्ष 2012 में अकादमिक क्षेत्र का दुनिया का सबसे अधिक राशि वाला यानी पहला ब्रेकथ्रू प्राइज इन फंडामेंटल फिजिक्स प्राइज भी दिया जा चुका है

यह फिजिक्स के नोबेल पुरस्कार का लगभग 3 गुना है. सेन को 14 साल पहले इस अवॉर्ड में 30 लाख डॉलर यानी आज के लगभग 28 करोड़ रुपए मिले थे. कोलकाता के बंगाली मीडियम स्कूल से आईआईटी और फिर अमेरिका से पीएचडी
सेना कोलकाता के बंगाली माध्यम स्कूल से अमेरिका में पीएचडी तक पहुंचे.

अंग्रेजी उन्हें बचपन में न के बराबर आती थी. 11 वीं में उन्हें पता चला कि आईआईटी नाम का संस्थान होता है. फिर वे अंग्रेजी की ओर ध्यान देने लगे. 1975 में प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर से मास्टर डिग्री हासिल की.

आईआईटी के बाद उनकी जिंदगी बदल गई. आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें अमेरिका के स्टोनी ब्रुक विश्वविद्यालय में दाखिला मिला. यहीं से पीएचडी की. फर्मिलैब और स्टैनफोर्ड जैसी दुनिया की शीर्ष प्रयोगशालाओं में शोध कार्य किया. उनके पास विदेश में बेहतरीन अवसर थे लेकिन उन्होंने भारत वापसी का निर्णय लिया.

उन्हें पहले डिराक मेडल और इन्फोसिस प्राइज जैसे कई अन्य पुरस्कार भी मिल चुके हैं. वर्ष 1998 में स्टीफन हॉकिंग ने उन्हें रॉयल ​​सोसाइटी की फेलोशिप के लिए नामांकित किया था. अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज के निर्वाचित अंतर्राष्ट्रीय मानद सदस्य (अप्रैल 2026) बने. रॉयल सोसाइटी के फेलो (1998) बने.

कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ ही उन्हें भारत सरकार पद्म भूषण सम्मान से भी सम्मानित किया है. 2001 में उन्हें पद्मश्री मिला और 2013 में पद्म भूषण. बेंगलुरु आने से पहले सेन ने TIFR, मुंबई और हरीश चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट प्रयागराज में अपना रिसर्च कार्य किया था.

प्रयागराज के अपने संस्थान में वे साइकिल से ही आते-जाते थे. उनके पिता भी भौतिकी विज्ञान के ही शिक्षक थे. वे स्कॉटिश चर्च कॉलेज में भौतिकी पढ़ाते थे. सेन बेहद सादगी भरा जीवन जीते हैं. वे हमेशा कैंपस में साइकिल से आते हैं. प्रोफेसर सेन किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद नहीं है.